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माननीय न्यायमूर्ति श्री बी. अमित स्थलेकर को राष्ट्रीय हरित अधिकरण की पूर्वी आंचलिक पीठ, कोलकाता में न्यायिक सदस्य के रूप में दिनांक 07.04.2021 (पूर्वाह्न) को नियुक्त किया गया।

वे एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता हैं और उन्होंने लगभग 37 वर्षों तक विधि के क्षेत्र में वकील तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उत्कृष्ट सेवाएँ दी हैं। उनका जन्म 25.12.1958 को हुआ। उन्होंने सेंट जोसेफ कॉलेज, इलाहाबाद तथा सेंट जोसेफ कॉलेज, नैनीताल में शिक्षा प्राप्त की और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विधि स्नातक किया। वर्ष 1983 में उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत प्रारंभ की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 1986 से 2011 तक रेलवे के स्थायी अधिवक्ता के रूप में कार्य किया तथा भारत संघ, भारत संचार निगम लिमिटेड और उत्तर प्रदेश के महालेखाकार कार्यालय के लिए 1991 से 2004 तक कार्य किया। वे उत्तर प्रदेश राज्य के अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता भी रहे। न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से पूर्व वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विशेष अधिवक्ता भी थे।

वर्ष 2011 में उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया तथा 2013 में उन्होंने स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। दिसंबर 2020 में वे सेवानिवृत्त हुए।

माननीय न्यायमूर्ति श्री बी. अमित स्थलेकर द्वारा दिए गए कुछ महत्वपूर्ण निर्णय निम्नलिखित हैं:

  1. रिट याचिका संख्या 12759/2019 दिनांक 22.05.2019: इस मामले में विवाद “न्यायसंगत मुआवजा और भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013” (इसमें इसके बाद अधिनियम, 2013) तथा “श्री काशी विश्वनाथ विशेष क्षेत्र विकास बोर्ड वाराणसी अधिनियम, 2018” (इसमें इसके बाद अधिनियम, 2018) की लागू होने की स्थिति से संबंधित था।

याचिकाओं के समूह को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि अधिनियम, 2013 की धारा 46, जो पुनर्वास योजना को अनिवार्य बनाती है, याचिकाकर्ताओं पर लागू नहीं होती क्योंकि संबंधित संपत्ति अधिनियम, 2013 के अंतर्गत अधिग्रहित नहीं की जा रही थी, बल्कि क्रय की जा रही थी। 

यह भी कहा गया कि अधिनियम, 2018 में भूमि अधिग्रहण की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि यह व्यवस्था केवल अधिनियम, 2013 में ही उपलब्ध है। 

  1. रिट याचिका संख्या 20690/2003: इस मामले में भूमि के अनुमानित उपयोग के आधार पर स्टाम्प शुल्क निर्धारण को मनमाना माना गया। 

इस निर्णय में संपत्ति के मूल्यांकन और स्टाम्प शुल्क निर्धारण के उचित चरण और मानदंडों पर चर्चा की गई। 

न्यायालय ने कहा कि भूमि के उपयोग की प्रकृति का निर्धारण खरीद की तिथि के आधार पर किया जाना चाहिए और इसी तिथि के संदर्भ में भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 की धारा 47-ए(3) के तहत स्टाम्प शुल्क की गणना की जानी चाहिए। यह भी निर्णय दिया गया कि भविष्य की संभावित उपयोगिता के आधार पर स्टाम्प शुल्क नहीं लगाया जा सकता।

श्री ईश्वर सिंह मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जयपुर से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक हैं तथा पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होंने एल.एल.बी. की उपाधि प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी से एसोसिएट डिप्लोमा (जो एम.एससी. वानिकी के समकक्ष है) भी अर्जित किया है। वे 1988 बैच के भारतीय वन सेवा के अधिकारी हैं और AGMUT कैडर से संबंधित रहे हैं। वे 34 वर्षों की दीर्घ सेवा के पश्चात दिल्ली सरकार में प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत्ति हुए। अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया, जिनमें मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, रिज प्रबंधन बोर्ड के सदस्य सचिव, पर्यावरण निदेशक, चंडीगढ़ औषधीय पादप बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, पशु कल्याण बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तथा प्रदूषण नियंत्रण समिति के सदस्य के रूप में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

उन्होंने दिल्ली और चंडीगढ़ में हरित कार्य योजनाओं के निर्माण एवं सफल क्रियान्वयन में उल्लेखनीय योगदान दिया, जिसके लिए उन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने सुखना वन्यजीव अभयारण्य में लैंटाना जैसी आक्रामक प्रजातियों को हटाकर जैव विविधता के पुनर्स्थापन का नेतृत्व किया तथा चंडीगढ़ में 175 एकड़ के एक बॉटनिकल गार्डन की स्थापना की।

उन्होंने पॉलिथीन बैग पर प्रतिबंध लागू करने में भी योगदान दिया और “वेस्ट टू वेल्थ” पहल की शुरुआत की।

उन्होंने दिनांक 14 अगस्त 2025 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण में विशेषज्ञ सदस्य के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।

Click here to see 25th March 2019 Cause List of Kolkata Zone Bench Through Video Conferencing

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