श्री सिद्धांत दास भारतीय वन सेवा के 1982 बैच के अधिकारी हैं, जो ओडिशा कैडर से संबंधित हैं। उन्होंने भौतिकी, वानिकी और व्यवसाय प्रशासन में परास्नातक की डिग्री प्राप्त की है। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग, यूके से “एग्रो-फॉरेस्ट्री” और “ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स” जैसे पाठ्यक्रम भी किए हैं। वे देश में वानिकी क्षेत्र के सर्वोच्च पद तक पहुंचे और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार में वन महानिदेशक एवं विशेष सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए।
वन महानिदेशक के रूप में अपने 33 महीनों के कार्यकाल में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पहल कीं, जिनमें (क) राष्ट्रीय वन नीति का मसौदा तैयार करना, (ख) देश की प्रमुख नदी प्रणालियों के लिए परिदृश्य आधारित कैचमेंट क्षेत्र उपचार योजना विकसित करना, (ग) सभी प्रकार के वनों की सीमाओं का डिजिटलीकरण प्रारंभ करना, (घ) भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद में समन्वित अनुसंधान कार्यक्रम और उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करना, (ङ) देश के लिए वन अग्नि प्रबंधन योजना तैयार करना, (च) लकड़ी आधारित उद्योगों के प्रबंधन हेतु नीति बनाना, (छ) वन उपज के परिवहन के लिए सरल और पारदर्शी प्रक्रियाएं विकसित करना, (ज) वन्यजीव एवं संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन के लिए मजबूत योजना बनाना, तथा (झ) देश में वन प्रमाणन की शुरुआत करना शामिल है।
वे ओडिशा राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से जुड़ने वाले पहले और एकमात्र पूर्णकालिक अधिकारी थे, जब इसे अक्तूबर 1999 में आए विनाशकारी सुपर चक्रवात के बाद स्थापित किया गया था। यह देश का पहला ऐसा संगठन था, जिसने अन्य राज्यों और केंद्र में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के गठन को प्रेरित किया। इसके परिणामस्वरूप आपदा प्रबंधन में एक बड़ा बदलाव आया; राहत, पुनर्स्थापन और पुनर्निर्माण से हटकर योजना, तैयारी और रोकथाम पर जोर दिया गया। श्री दास ने देश की पहली राज्य आपदा प्रबंधन नीति और योजना का मसौदा तैयार किया।
उनमें शिक्षण का विशेष कौशल है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी में 5 वर्षों तक प्रोफेसर और एक रेंजर्स कॉलेज के प्राचार्य के रूप में 3 वर्षों तक कार्य करते हुए उन्होंने नवाचारी और परस्पर क्रियात्मक शिक्षण विधियों की शुरुआत की।
उन्होंने अपने करियर में 4 वर्षों तक जिला स्तर पर, 4 वर्षों तक पर्यवेक्षण स्तर पर और 2 वर्षों तक राज्य स्तर पर वन और वन्यजीव संसाधनों का प्रबंधन किया। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वे सभी के लिए सहज रूप से उपलब्ध रहे। वे अपने मानवीय दृष्टिकोण, प्रशासन में संवेदनशीलता और अधीनस्थों तथा वन पर निर्भर समुदायों के प्रति सहानुभूति के लिए जाने जाते थे।
उन्होंने 4 वर्षों तक ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सचिव के रूप में कार्य किया और पर्यावरण कानूनों के सख्त अनुपालन के लिए प्रसिद्ध हुए। उन्होंने निष्पक्ष और पारदर्शी पर्यावरण प्रशासन प्रणाली स्थापित की, जिससे ईमानदारी सुनिश्चित हुई। उन्होंने इस धारणा को तोड़ा कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केवल निजी क्षेत्र पर कार्रवाई करता है, जब उन्होंने 2 नवरत्न सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को भी बंद करवाया।
उन्होंने 2 वर्षों तक संयुक्त राष्ट्र की संस्था वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के अंतर्गत चयनित आदिवासी आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के परियोजना निदेशक के रूप में कार्य किया।
सेवानिवृत्ति के बाद, वे दिनांक 1 जनवरी 2020 से 17 जुलाई 2020 तक राष्ट्रीय हरित अधिकरण में विशेषज्ञ सदस्य के रूप में कार्यरत रहे।

