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डॉ. अरुण कुमार वर्मा

डॉ. अरुण कुमार वर्मा ने 1986 में भारतीय वन सेवा में प्रवेश किया और गुजरात के प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए। वे भौतिकी में स्नातकोत्तर हैं। आईआईएम बैंगलोर से अपने पीजीपीपीएम के दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सिद्धांतों और बहुपक्षीय पर्यावरणीय वार्ताओं पर कार्य किया तथा “भारतीय पर्यावरण कूटनीति: फोकस और फ्रेमवर्क” विषय पर शोध प्रबंध तैयार किया। अमेरिका के मैक्सवेल स्कूल ऑफ सिटिजनशिप एंड पब्लिक अफेयर्स, सिरैक्यूज़ में उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अंतर-सीमाई संघर्षों का विश्लेषण करने का कौशल विकसित किया, विशेष रूप से मेकांग नदी वार्ता के संदर्भ में। वे जनजातीय विकास नीति में पीएच.डी. धारक हैं।

अपने प्रारंभिक सेवा काल में उन्होंने गुजरात के सबसे बड़े, उत्पादक लेकिन समस्याग्रस्त वन क्षेत्रों का प्रबंधन सहभागी दृष्टिकोण और संयुक्त वन प्रबंधन के माध्यम से किया। उन्होंने राज्य के वन क्षेत्र में कई नए अवधारणाओं को विकसित किया, जैसे नई पीढ़ी की वन प्रबंधन योजना और शहरी वानिकी के माध्यम से शहरी पारिस्थितिकी प्रबंधन।

गुजरात पारिस्थितिकी आयोग के सदस्य सचिव के रूप में उन्होंने राज्य की पारिस्थितिक स्थिति पर कार्य किया और विभिन्न कृषि-जलवायु एवं जैविक क्षेत्रों में पारिस्थितिकी आधारित विकास को बढ़ावा दिया। उन्होंने जन भागीदारी के साथ 16,000 हेक्टेयर के सबसे बड़े मैंग्रोव वृक्षारोपण परियोजना का संचालन किया। वे विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन परियोजना के परियोजना निदेशक भी रहे, जिसमें उन्होंने संसाधन प्रबंधन में जनभागीदारी, कच्छ की खाड़ी के आसपास के क्षेत्रों में शहरी अपशिष्ट प्रबंधन, राज्य एजेंसियों की क्षमता निर्माण तथा संकटग्रस्त प्रजातियों और समुद्री पारिस्थितिकी एवं प्रवाल संरक्षण के लिए रणनीतियाँ विकसित कीं। उन्होंने विशेषज्ञों और शिक्षाविदों के साथ मिलकर वर्ष 2012 में गुजरात की 9-खंडीय “स्टेट ऑफ एनवायरनमेंट रिपोर्ट” के संपादन का नेतृत्व किया।

डॉ. वर्मा सतत विकास के क्षेत्र में विशिष्ट अनुभव रखते हैं, क्योंकि उन्होंने न केवल वन और पर्यावरण क्षेत्र में कार्य किया है, बल्कि विकास प्रशासन और अवसंरचना प्रबंधन में भी लंबा अनुभव प्राप्त किया है। उन्होंने गुजरात में जनजातीय विकास आयुक्त के रूप में लगभग 75 लाख वनवासियों और अनुसूचित जनजाति समुदायों के समग्र विकास का दायित्व संभाला। वे गुजरात की वनबंधु कल्याण योजना के प्रमुख वास्तुकार रहे। ऊर्जा क्षेत्र में उन्होंने उत्तर गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (यूजीवीसीएल) के प्रबंध निदेशक के रूप में कार्य किया। उनके नेतृत्व में यूजीवीसीएल  को वर्ष 2010-11 में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए भारत सरकार का गोल्ड शील्ड पुरस्कार मिला। उन्होंने भारत सरकार में ऊर्जा मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रूप में भी कार्य किया और सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी-7) के अनुरूप ग्रामीण और घरेलू विद्युतीकरण को बढ़ावा दिया। ‘सौभाग्य’ योजना उनकी महत्वपूर्ण पहल थी। उन्होंने बिजली वितरण सुधार, स्मार्ट ग्रिड, शहरी विद्युत प्रणालियों के विकास, डिस्कॉम्स के आईटी सशक्तिकरण, परियोजना वित्त और ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत सरकार द्वारा उन्हें लगभग छह वर्षों तक परामर्श समूह के सदस्य के रूप में नामित किया गया, जहाँ उन्होंने सतत विकास आयोग और मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से संबंधित मामलों पर सलाह दी। उन्हें वर्ष 2010 में सार्वजनिक सेवा में उत्कृष्ट योगदान के लिए “राष्ट्रीय गौरव पुरस्कार” से सम्मानित किया गया तथा वर्ष 2016 में ग्रामीण विद्युतीकरण के लिए गर्व ऐप हेतु “डिजिटल इंडिया अवार्ड” प्राप्त हुआ।

उन्होंने दिनांक 12 अप्रैल 2021 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण में विशेषज्ञ सदस्य के रूप में पदभार ग्रहण किया।

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