डॉ. सत्यगोपाल कोरलापट्टी भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1987 बैच के अधिकारी हैं, जिन्हें तमिलनाडु कैडर आवंटित किया गया है। उन्होंने प्राणिविज्ञान में परास्नातक (द्वितीय रैंक एवं विशिष्टता सहित) और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है, साथ ही पर्यावरण अध्ययन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी किया है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने मैक्सवेल स्कूल, सेराक्यूस विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन में परास्नातक तथा स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्ययार्क कॉलेज ऑफ़ एनवायर्नमेंटल साइंस एंड फॉरेस्ट्री से पर्यावरणीय निर्णय-निर्माण में स्नातक प्रमाणपत्र प्राप्त किया है। उन्हें शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मान ‘फाई बीटा डेल्टा अवार्ड’ भी प्राप्त हुआ है।
उन्होंने तमिलनाडू राज्य और भारत सरकार में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर व्यापक कार्य किया है। अपने फील्ड कार्यकाल में उप-कलेक्टर, अतिरिक्त कलेक्टर (विकास) और जिला कलेक्टर के रूप में उन्होंने मृदा एवं जल संरक्षण, एकीकृत जलग्रहण प्रबंधन, जलमार्गों एवं जलाशयों का पुनर्वास और पुनर्स्थापन, सूखा शमन, वनीकरण और सतत ग्रामीण विकास को बढ़ावा दिया। साथ ही, उन्होंने सामुदायिक एवं गैर-सरकारी संगठनों की भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने महत्वपूर्ण स्थानों को जोड़ने के लिए संपर्क सड़कों का निर्माण और नदियों/नालों पर पुलों का निर्माण करवाया, जिससे आवागमन सुगम हुआ और ईंधन की खपत में कमी आई।
थेनी ज़िले के कलेक्टर के रूप में, उन्होंने कई नवाचारपूर्ण पहलें शुरू कीं, जैसे कि कृषि क्षेत्रों से होकर बहने वाली धाराओं में बड़े पैमाने पर चेक डैमों की श्रृंखला का निर्माण, ताकि कुओं का पुनर्भरण (रीचार्ज) हो सके। उन्होंने प्रमुख चेक डैमों को जोड़ते हुए पहाड़ी संरचनाओं का निर्माण भी करवाया, जिससे वन क्षेत्रों पर मानव और जैविक दबाव कम हो तथा भूजल का स्तर बढ़े और किसानों को लाभ मिले। उन्होंने तमिलनाडु वनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न योजनाओं का जलग्रहण क्षेत्र (वाटरशेड) के आधार पर समन्वय भी किया, जो अन्य ज़िलों के लिए एक आदर्श मॉडल बन गया है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट हेल्थ मैनेजमेंट के महानिदेशक के रूप में, उन्होंने जलवायु-सहिष्णु (क्लाइमेट रेज़िलिएंट) सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दिया। इसके लिए उन्होंने कृषि-परितंत्र विश्लेषण (एग्रो-इकोसिस्टम एनालिसिस) आधारित एकीकृत कीट प्रबंधन को कीट प्रबंधन हेतु पारिस्थितिक अभियांत्रिकी (इकोलॉजिकल इंजीनियरिंग) के साथ समन्वित किया। उन्होंने कम लागत वाली तकनीकों को लोकप्रिय बनाया, जिन्हें किसान स्तर पर अपनाकर सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशक (माइक्रोबियल बायोपेस्टिसाइड्स), परजीवी कीट (पैरासिटॉइड्स) और शिकारी कीट (प्रिडेटर्स) का उत्पादन किया जा सके, जिससे रासायनिक कृषि-रसायनों पर निर्भरता कम हो। उन्होंने अमेरिका के कृषि विभाग तथा ऑस्ट्रेलिया के कृषि विभाग के साथ साझेदारी स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, ताकि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से सतत कृषि पद्धतियों, स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता (सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी) उपायों तथा जैव-सुरक्षा (बायो-सिक्योरिटी) को बढ़ावा देने के लिए कौशल विकसित किए जा सकें। उन्होंने “प्लांट क्वारंटाइन (भारत में आयात का विनियमन) आदेश, 2003” के कुछ प्रावधानों में संशोधन के लिए सिफारिशें कीं, जिन्हें कृषि मंत्रालय ने स्वीकार किया, ताकि देशी जैव-विविधता की रक्षा की जा सके। वे उस समिति के अध्यक्ष भी थे, जिसने पारिस्थितिकी-आधारित रणनीतियों पर आधारित संशोधित आई.पी.एम. पैकेज तैयार किए। उनकी अध्यक्षता वाली समिति द्वारा “कीटनाशक नियम, 1971” के नियम 19 (लेबलिंग की विधि) और नियम 18 (पुस्तिका/लीफलेट) में संशोधन के लिए की गई सिफारिशें ताकि लेबल दावों को अधिक पारदर्शी बनाया जा सके; भी स्वीकार की गईं।
अतिरिक्त मुख्य सचिव/राजस्व प्रशासन आयुक्त एवं राज्य राहत आयुक्त के रूप में, उन्होंने आपदा जोखिम को कम करने और आपदा के प्रति लचीलापन (रेज़िलिएंस) बढ़ाने के लिए तैयारी, बचाव, राहत और “बिल्ड बैक बेटर” प्रणालियों को मजबूत किया। उनके कार्यकाल के दौरान कई नई पहलें शुरू की गईं, जिन्हें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा श्रेष्ठ प्रथाओं के रूप में पहचाना गया और अन्य राज्यों को अपनाने के लिए अनुशंसित किया गया। उन्होंने तमिलनाडू राज्य आपदा प्रबंधन परिप्रेक्ष्य योजना 2018-2030 तैयार की और उसकी स्वीकृति प्राप्त की, जो नदी घाटियों के समग्र प्रबंधन और नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों की सुरक्षा के लिए एक प्रणालीगत दृष्टिकोण अपनाती है, ताकि आपदा जोखिम को कम किया जा सके और सेंदाई फ्रेमवर्क के प्रमुख लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके। राज्य राहत आयुक्त के रूप में, उन्होंने 2016 और 2017 के दौरान तमिलनाडु में आए भीषण सूखे तथा 2019 में चेन्नई और अन्य कुछ जिलों में उत्पन्न गंभीर जल संकट का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया। उन्होंने बाढ़ शमन के लिए कई उपाय भी शुरू किए, जैसे कट-एंड-कवर नहरें, नदी आधारित जलाशय, अंतर-घाटी जल हस्तांतरण के लिए डायवर्जन नहरें, तथा कंक्रीट के अधिशेष जल निकास के स्थान पर शटर प्रणाली का उपयोग आदि। इन उपायों ने चेन्नई और उसके आसपास के अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में स्थायी समाधान प्रदान किया। उन्होंने वर्धा, ओखी और गाजा जैसे गंभीर चक्रवातों का सफलतापूर्वक सामना किया और जनहानि को न्यूनतम रखा। उन्होंने बड़े पैमाने पर वर्षा जल संचयन कार्यों, अनुपयोगी रिचार्ज बोरवेल और खुले कुओं को पुनर्भरण संरचनाओं में परिवर्तित करने तथा मंदिर तालाबों के जीर्णोद्धार में विशेष रुचि ली।
टीएनडब्ल्यूआरसीआरआरसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक के रूप में, उनके द्वारा कझुवेली चेक डैम प्रस्ताव में संशोधन का सुझाव दिया गया, जिसमें बिना मूल लागत ₹161 करोड़ में किसी वृद्धि के भंडारण क्षमता को मूल प्रस्तावित 2 टीएमसी से बढ़ाकर 6.6 टीएमसी करने का प्रस्ताव था। इस प्रस्ताव को तमिलनाडू सरकार द्वारा स्वीकार किया गया। परियोजना के पूर्ण होने पर कझुवेली झील में संग्रहित जल, ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन और विलुप्पुरम जिले की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जल संसाधनों में महत्वपूर्ण वृद्धि करेगा। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कांचीपुरम जिले के सिक्करायापुरम में स्थित 25 परित्यक्त खदान स्थलों को एकीकृत कर एक मोनोलिथिक जल भंडारण संरचना बनाने तथा चेम्बरमबक्कम जलाशय के अधिशेष जल को कट-एंड-कवर डायवर्जन नहर के माध्यम से इन खदानों तक मोड़ने का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया, जिससे चेन्नई के लिए जल स्रोतों में वृद्धि हो सके।
नवाचार:
उन्होंने “सीआरए तकनीक” विकसित की, जो कम पानी में पेड़ों/लताओं को तेजी से बढ़ाने और बेहतर उत्पादन देने में सहायक है। यह तकनीक कार्बन अवशोषण को बढ़ाती है, कार्बन उत्सर्जन को कम करती है तथा सूखा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद करती है।
उन्होंने (संयुक्त रूप से) माइकोराइज़ा, एंटोमोपैथोजेनिक नेमाटोड्स तथा मृदा में पाए जाने वाले लाभकारी बैक्टीरिया और फफूंद के तेज़ी से संवर्धन के लिए एक नवीन माध्यम के कम लागत वाले उत्पादन की तकनीक विकसित की। इसके लिए एन.आई.पी.एच.एम. द्वारा पेटेंट के लिए आवेदन किए गए हैं, जो वर्तमान में उन्नत प्रक्रिया चरण में हैं।
राज्य राहत आयुक्त के रूप में, उन्होंने “तमिलनाडू सिस्टम फॉर मल्टी-हैज़र्ड इम्पैक्ट असेसमेंट, अलर्ट एंड इमरजेंसी रिस्पॉन्स प्लानिंग एंड ट्रैकिंग” नामक एक अभिनव वेब-GIS आधारित निर्णय सहायता प्रणाली की परिकल्पना की और उसे लागू किया। इसके साथ ही, उन्होंने एक मोबाइल एप्लिकेशन भी विकसित कराया, जिसमें एक विशेष अलार्म सुविधा है, जो जनहानि को रोकने और विभिन्न आपदाओं के लिए स्थान-विशिष्ट अलर्ट भेजने में सक्षम है (जिसे आर.आई.एम.ई.एस. के सहयोग से विकसित किया गया)।
Regional Integrated Multi-Hazard Early Warning System for Africa and Asia ने उन्हें एशिया और अफ्रीका में इन पहलों के प्रचार के लिए मानद सलाहकार नियुक्त किया। वे यूनिसेफ, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान आदि संस्थानों में रिसोर्स पर्सन के रूप में आमंत्रित किए गए हैं।
उन्हें दिनांक 12 अप्रैल 2021 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण में विशेषज्ञ सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है।

