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डॉ. अफरोज़ अहमद

डॉ. अफ़रोज़ अहमद का जन्म 14 नवंबर 1958 को उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसकी वंशावली लोदी वंश से जुड़ी है। 

वे एक विश्वप्रसिद्ध पर्यावरण वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, विकास प्रशासक और सिविल सेवक हैं। उन्होंने पर्यावरण प्रबंधन और संरक्षण में डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त की है तथा संयुक्त राष्ट्र (यूनेप/यूनेस्को) और जर्मनी सरकार के नीति-निर्माता अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया है। उन्होंने जर्मनी, ऑस्ट्रिया, रूस और चेकोस्लोवाकिया के विज्ञान अकादमियों, संयुक्त राष्ट्र संगठन, मंत्रालयों, संस्थानों और विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU), जॉर्डन में संयुक्त राष्ट्र का प्रथम अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व प्रशिक्षण भी प्राप्त किया, साथ ही इज़राइल, फिलिस्तीन और मिस्र में अकादमिक, वैज्ञानिक, राजनीतिक, कूटनीतिक और संयुक्त राष्ट्र संगठनों से संबंधित प्रशिक्षण भी लिया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने इंग्लैंड, स्वीडन, चीन और जापान में पर्यावरण संरक्षण एवं प्रबंधन के क्षेत्र में विशेष प्रशिक्षण भी प्राप्त किया है।

उन्हें पर्यावरण शासन, विकास प्रशासन, संघर्ष समाधान, कूटनीति, समन्वय तथा पर्यावरण प्रबंधन और सतत विकास के क्षेत्र में नीतियों और कार्यक्रमों के निर्माण एवं क्रियान्वयन का तीन दशकों से अधिक का अनुभव है।

उन्होंने वर्ष 2019–2020 के दौरान महाराष्ट्र सरकार के पर्यावरण एवं वन मामलों के सलाहकार के रूप में “राज्य अतिथि” के दर्जे के साथ कार्य किया, जिसकी नियुक्ति महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री (देवेंद्र फडणवीस एवं उद्धव बाल ठाकरे) द्वारा की गई थी। उन्होंने 2014–2018 के दौरान नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण, जल शक्ति मंत्रालय, जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग, भारत सरकार में सदस्य (पर्यावरण एवं पुनर्वास) के रूप में तथा 2018 में सदस्य (सिविल) के रूप में कार्य किया। उनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति  द्वारा की गई थी। उन्होंने 1991–2014 के दौरान निदेशक (पुनर्वास एवं प्रभाव आकलन) के रूप में सेवाएं दीं। इसके अतिरिक्त, 2008–2015 के दौरान भारत सरकार के केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा उन्हें मुख्य सतर्कता अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने 2015–2018 के दौरान नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण  में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत अपीलीय प्राधिकारी के रूप में भी कार्य किया। इसके साथ ही, वे 1989 से 1991 तक भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान में संस्थापक वैज्ञानिक के रूप में भी कार्यरत रहे।

उनके प्रमुख योगदान इस प्रकार हैं:

  • हिमालय, इंडो-गंगेटिक मैदान और प्रायद्वीपीय भारत में पर्यावरण प्रभाव आकलन और सतत विकास के कार्यान्वयन के अग्रणी। 

  • एकीकृत पर्यावरण के साथ विकास सुनिश्चित किया, मानवाधिकारों एवं पुनर्वास को प्राथमिकता दी, तथा नर्मदा घाटी के बड़े बांधों से विस्थापित लगभग दस लाख लोगों (मुख्यतः आदिवासी) के पुनर्वास में योगदान दिया। नर्मदा परियोजनाओं को चुनौती देने वाले लगभग दो दर्जन मुकदमों का सर्वोच्च न्यायालय, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय और ग्रीन ट्रिब्यूनल में समन्वय किया तथा उनकी रक्षा के लिए रणनीतियाँ विकसित कीं (यह एक अत्यंत कठिन कार्य था)।  इसके परिणामस्वरूप सरदार सरोवर नर्मदा बांध (विश्व की सबसे चर्चित एवं सबसे बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में से एक), स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा) तथा नर्मदा बेसिन की अन्य परियोजनाओं का सफलतापूर्वक पूर्ण होना संभव हुआ।

  • गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीच पर्यावरण, वन और पुनर्वास से जुड़े अंतरराज्यीय विवादों का समाधान। 

  • उन्नीस सौ अस्सी के दशक के अंत में भारत तथा विदेशों (ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, यूके, जर्मनी, जापान, स्वीडन, यूरोपीय संसद आदि) में नर्मदा बांधों के विरुद्ध शुरू हुए विश्व के सबसे बड़े जन आंदोलन का कूटनीति, वार्ता और संवाद के माध्यम से प्रभावी ढंग से सामना किया। इसमें सौ से अधिक आंदोलनों/धरनों/प्रदर्शनों/अनशन/जन सुनवाइयों का प्रबंधन भी शामिल था, जिन्हें प्रमुख कार्यकर्ताओं, गैर-सरकारी संगठनों, सिविल सोसाइटी, पूर्व सिविल सेवकों/न्यायाधीशों, केंद्रीय एवं राज्य मंत्रियों, तथा प्रमुख धार्मिक, मानवाधिकार, फिल्म, कला जगत और अन्य प्रसिद्ध हस्तियों जैसे बाबा आमटे, मेधा पाटकर, अरुंधति रॉय, अरविंद केजरीवाल आदि द्वारा नर्मदा घाटी के बड़े बांधों से जुड़े पुनर्वास, वन एवं पर्यावरण के मुद्दों पर चलाया गया।

  • देश में साझा प्राकृतिक संसाधनों एवं सतत विकास से जुड़े संघर्षों के समाधान हेतु वार्ता और कूटनीति की प्रभावी कार्यप्रणाली विकसित की तथा उन्हें व्यवहारिक स्तर पर लागू किया।

  • पर्यावरण प्रबंधन एवं सतत विकास के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहल को सशक्त किया, जिसके अंतर्गत भारत तथा यूरोप, अफ्रीका और एशिया के कई देशों में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, आईआईटी, संस्थानों, अकादमियों, मंत्रालयों और भारत में स्थित संयुक्त राष्ट्र संगठन के कार्यालयों में 1000 से अधिक व्याख्यान दिए।

  • देश के अधिकांश राज्यों में जमीनी स्तर (पंचायतों) पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के संप्रेषण और अनुप्रयोग के लिए नीतियों एवं कार्यक्रमों का विकास किया।

  • वर्ष 2002 में भारत में इंडियन एनवायरनमेंट सर्विस (IES) की वकालत करने में अग्रणी भूमिका निभाई।

  • भारत में आर्द्रभूमि के संरक्षण एवं प्रबंधन हेतु “आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन नियम), 2017” आदि के अंतर्गत दिशा-निर्देश तैयार किए।

उन्होंने पर्यावरण एवं विकास से जुड़े मुद्दों पर विश्व के प्रमुख नेताओं के साथ संवाद स्थापित करने का गौरव प्राप्त किया है, जिनमें जॉर्डन के महाराज किंग हुसैन एवं क्वीन नूर, क्राउन प्रिंस हसन, डॉ. मजाली (प्रधानमंत्री), सीनेट के अध्यक्ष तथा कई मंत्री; फ़िलिस्तीन में नोबेल पुरस्कार विजेता यासिर अराफ़ात, डॉ. हनन अशरावी एवं कई मंत्री; इज़राइल में नोबेल पुरस्कार विजेता शिमोन पेरेस (प्रधानमंत्री), संसद के अध्यक्ष एवं कई मंत्री; ऑस्ट्रिया में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. कॉनराड लॉरेंज़ (एथोलॉजिस्ट); मिस्र में अम्र मूसा (विदेश मंत्री) एवं कई नेतृत्व विशेषज्ञ; यूरोपीय संसद की अध्यक्ष सिमोन वील; यूनाइटेड किंगडम के रक्षा मंत्री इयान गिल्मोर; अमेरिका के विदेश मंत्री डॉ. हार्लन क्लीवलैंड; तथा ऑस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया, चीन, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान, पाकिस्तान, रूस, स्वीडन आदि देशों के कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, संयुक्त राष्ट्र एवं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से जुड़े 50 से अधिक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व और प्रख्यात राजनेता शामिल हैं।

उन्होंने भारत के राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल एवं डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तथा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह को नर्मदा से संबंधित विषयों पर, और राजीव गांधी को हिमालय से जुड़े मुद्दों पर परामर्श/संक्षिप्त जानकारी देने का गौरव प्राप्त किया है। वे वर्ष 2002 से नर्मदा, पर्यावरण एवं सतत विकास से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों के विषय में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ निकटता से कार्य करते रहे हैं तथा समय-समय पर उन्हें परामर्श देते रहे हैं।

उन्हें अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून से संबंधित मुद्दों पर नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी. उपाध्याय, इटली के सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अमेदेओ पोस्टिग्लियोने, तथा स्विट्ज़रलैंड, जापान, चीन, स्वीडन, जर्मनी, ऑस्ट्रिया के प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं के साथ चर्चा करने का श्रेय प्राप्त है। साथ ही, उन्होंने भारत के पर्यावरण कानून से संबंधित विषयों पर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों न्यायमूर्ति ए.एम. अहमदी, न्यायमूर्ति ए.एस. आनंद, न्यायमूर्ति बी.एन. किरपाल, न्यायमूर्ति वाई.के. सभरवाल, न्यायमूर्ति आर.सी. लाहोटी के साथ भी संवाद किया है। उन्होंने नर्मदा से जुड़े मामलों में भारत के अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी, अशोक देसाई, जी.ई. वाहनवती, मुकुल रोहतगी तथा सॉलिसिटर जनरल डी.पी. गुप्ता, हरीश साल्वे, किरीट रावल, एस.जी. सुब्रमणियन, तुषार मेहता को परामर्श एवं सहयोग प्रदान किया है।

उन्होंने पर्यावरण प्रभाव आकलन पर एक पुस्तक लिखी है, जो संयुक्त राष्ट्र (यूनेप/यूनेस्को) एवं जर्मनी सरकार द्वारा प्रकाशित की गई है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, ग्रामीण पुनर्निर्माण एवं मानव पुनर्वास की सफलता कथाओं पर आधारित 2 पुस्तकें तथा उनके मूल विचार एवं योगदान पर आधारित 2 लघु फिल्में (जो पर्यावरण और विकास के एकीकरण की सफलता को दर्शाती हैं) महाराष्ट्र सरकार द्वारा निर्मित की गई हैं। उन्होंने 125 से अधिक शोध पत्र/लेख/रिपोर्ट भी लिखे हैं, जिनमें से तीन शोध पत्र स्वीडन की द रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा प्रकाशित किए गए हैं, जो नोबेल पुरस्कार विजेताओं का चयन करती है। ये सभी कार्य पर्यावरण प्रबंधन, सतत विकास, मानव पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन, तथा ग्रामीण एवं शहरी पुनर्निर्माण से संबंधित नीतियों/कार्यक्रमों की योजना और उनके व्यावहारिक क्रियान्वयन पर केंद्रित हैं।

उन्होंने पर्यावरण एवं विकास से संबंधित केंद्रीय एवं राज्य सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों/संस्थाओं तथा सिविल सोसाइटी की कई उच्च स्तरीय समितियों में अध्यक्ष एवं नामित सदस्य के रूप में कार्य किया है। उन्हें अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान, पुरस्कार, प्रशंसा एवं मान्यताएँ प्राप्त हुई हैं। वे व्यापक रूप से विदेश यात्राएँ कर चुके हैं तथा विदेशों में भारत सरकार/भारत का व्यापक प्रतिनिधित्व किया है।

उन्होंने 15 जनवरी 2022 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति द्वारा नियुक्ति के पश्चात राष्ट्रीय हरित अधिकरण के विशेषज्ञ सदस्य का दायित्व ग्रहण किया।

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राष्ट्रीय हरित अधिकरण
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