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डॉ. ए. सेंथिल वेल

डॉ. ऐ. सेंथिल वेल मछली पालन विज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर हैं, जिन्होंने कर्नाटक के मंगलुरु स्थित कॉलेज ऑफ फिशरीज से अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने चेन्नई के अन्ना विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन मैनेजमेंट से भारत की तटीय प्रबंधन नीति पर पीएच.डी. की।

उन्होंने 1991 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में वैज्ञानिक के रूप में कार्यभार संभाला। मंत्रालय में उन्होंने कई विभागों में काम किया, जिनमें पर्यावरण प्रभाव आकलन, प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण शिक्षा, ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन, दिल्ली में वायु प्रदूषण नियंत्रण, स्वच्छ भारत अभियान, पर्यावरण मानक, राष्ट्रीय नदी संरक्षण और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन शामिल हैं।

उन्हें विश्व बैंक द्वारा समर्थित इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन कंट्रोल प्रोजेक्ट का प्रोजेक्ट डायरेक्टर भी नियुक्त किया गया था। इस परियोजना में कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट्स की स्थापना, उद्योगों के लिए एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट्स, तथा राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की क्षमता निर्माण और उन्नयन शामिल था। उन्होंने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के बेंगलुरु क्षेत्रीय कार्यालय में भी कार्य किया, जहाँ उन्होंने पर्यावरण प्रभाव आकलन और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचनाओं के तहत स्वीकृत परियोजनाओं की निगरानी की, साथ ही वन्यजीव और वन संरक्षण अधिनियम से संबंधित कार्य भी संभाले।

डॉ. वेल प्रोफेसर एम.एस. स्वामीनाथन और डॉ. शैलेश नायक के नेतृत्व में गठित उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समितियों के सदस्य सचिव भी रहे, जिन्होंने तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचनाओं की समीक्षा की। समिति की रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने कोस्टल ज़ोन रेगुलेशन 2011 और आइलैंड प्रोटेक्शन ज़ोन अधिसूचना 2011 के मसौदे तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्हें विश्व बैंक समर्थित इंटीग्रेटेड कोस्टल मैनेजमेंट प्रोजेक्ट का राष्ट्रीय परियोजना निदेशक भी नियुक्त किया गया। इस परियोजना के तहत उन्होंने सोसाइटी ऑफ इंटीग्रेटेड कोस्टल मैनेजमेंट, नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट सहित कई संस्थाओं की स्थापना की। इंटीग्रेटेड कोस्टल मैनेजमेंट परियोजना के तहत पहली बार देश में तटीय जोखिम मानचित्रण, तटीय-समुद्री पारिस्थितिक क्षेत्रों का मानचित्रण, सेडिमेंट सेल मैपिंग और आई.सी.जेड.एम.योजनाओं की तैयारी की गई।

वे प्रतिनियुक्ति पर 2019 से 2021 तक कॉलेज ऑफ फिशरीज में डीन और प्रोफेसर के रूप में भी कार्यरत रहे। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कर्नाटक की ब्लू इकोनॉमी क्षमता पर विश्व बैंक द्वारा प्रायोजित रिपोर्ट तथा कर्नाटक में मत्स्य पालन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर रिपोर्ट तैयार की। उनके 4 पुस्तकें और 25 वैज्ञानिक शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं।

उन्होंने  दिनांक 15 जनवरी 2022 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय हरित अधिकरण की प्रधान न्यायपीठ में विशेषज्ञ सदस्य के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।

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